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Tuesday, 7 June 2016

सोमवार का व्रत, शिव की भक्‍ति का प्रतीक है....


हिंदू धर्म के अनुसार सोमवार का दिन भगवान शिव को समर्पित है। इस दिन भगवान शिव को प्रसन्‍न करने के लिए व्रत रखने का विधान है। मान्‍यता है कि सोमवार के दिन व्रत रखने से भगवान शिव मनवांछित फल का वरदान देते हैं। कुंवारी कन्‍याओं द्वारा मनवांछित वी पाने हेतु सोलह सोमवार व्रत रखने की भी रीति है। सोमवार के व्रत में कथा सुनने से भी व्रत का फल अच्‍छा मिलता है।

माता पार्वती और भगवान शिव की इस बातचीत को साहूकार सुन रहा था। उसे न तो इस बात की खुशी थी और ना ही गम। वह पहले की भांति शिवजी की पूजा करता रहा। कुछ समय उपरांत साहूकार के घर एक पुत्र का जन्म हुआ। जब वह बालक ग्यारह वर्ष का हुआ तो उसे पढ़ने के लिए काशी भेज दिया गया।

दोनों मामा-भांजे इसी तरह यज्ञ कराते और ब्राह्मणों को दान-दक्षिणा देते काशी की ओर चल पड़े। राते में एक नगर पड़ा जहां नगर के राजा की कन्या का विवाह था। लेकिन जिस राजकुमार से उसका विवाह होने वाला था वह एक आंख से काना था। 
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Monday, 9 May 2016

शिव की भक्‍ति का प्रतीक है सोमवार का व्रत, पढ़ें कथा


हिंदू धर्म के अनुसार सोमवार का दिन भगवान शिव को समर्पित है। इस दिन भगवान शिव को प्रसन्‍न करने के लिए व्रत रखने का विधान है। मान्‍यता है कि सोमवार के दिन व्रत रखने से भगवान शिव मनवांछित फल का वरदान देते हैं। कुंवारी कन्‍याओं द्वारा मनवांछित वी पाने हेतु सोलह सोमवार व्रत रखने की भी रीति है। सोमवार के व्रत में कथा सुनने से भी व्रत का फल अच्‍छा मिलता है।
सोमवार व्रत कथा
किसी नगर में एक साहूकार रहता था। उसके घर में धन की कोई कमी नहीं थी लेकिन उसकी कोई संतान नहीं थी जिस वजह से वह बेहद दुखी था। पुत्र प्राप्ति के लिए वह प्रत्येक सोमवार व्रत रखता था और पूरी श्रद्धा के साथ शिवालय में जाकर भगवान शिव और पार्वती जी की पूजा करता था। उसकी भक्ति देखकर मां पार्वती प्रसन्न हो गईं और भगवान शिव से उस साहूकार की मनोकामना पूर्ण करने का निवेदन किया। पार्वती जी की इच्छा सुनकर भगवान शिव ने कहा कि “हे पार्वती! इस संसार में हर प्राणी को उसके कर्मों के अनुसार फल मिलता है और जिसके भाग्य में जो हो उसे भोगना ही पड़ता है।” लेकिन पार्वती जी ने साहूकार की भक्ति का मान रखने के लिए उसकी मनोकामना पूर्ण करने की इच्छा जताई। माता पार्वती के आग्रह पर शिवजी ने साहूकार को पुत्र-प्राप्ति का वरदान तो दिया लेकिन साथ ही यह भी कहा कि उसके बालक की आयु केवल बारह वर्ष होगी।
माता पार्वती और भगवान शिव की इस बातचीत को साहूकार सुन रहा था। उसे न तो इस बात की खुशी थी और ना ही गम। वह पहले की भांति शिवजी की पूजा करता रहा। कुछ समय उपरांत साहूकार के घर एक पुत्र का जन्म हुआ। जब वह बालक ग्यारह वर्ष का हुआ तो उसे पढ़ने के लिए काशी भेज दिया गया।
साहूकार ने पुत्र के मामा को बुलाकर उसे बहुत सारा धन दिया और कहा कि तुम इस बालक को काशी विद्या प्राप्ति के लिए ले जाओ और मार्ग में यज्ञ कराओ। जहां भी यज्ञ कराओ वहीं पर ब्राह्मणों को भोजन कराते और दक्षिणा देते हुए जाना।